कोरोनाकालः आपके अपनों को है आपकी बेहद जरूरत है

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कोरोनाकाल की वजह से न जाने की कितनी सस्ती हो गई है। यह आजकल के भारत में उपजे हालातों से जगजाहिर है। एक तरफ देश में लाशों का अंबार लगता जा रहा है।

कहीं चिताए जलाने के लिए श्मशान घाट कम पड़ रहे है, कही दफनाने के लिए कब्रिस्तान।

कोरोनाकाल पर कब जागेंगे देश के आलाकमान


रो – रो कर जनता की आंखों के आंसू सूख रहें है। पर हमारे देश के आला- कमान आते है, अपने आधे घंटे के जनता के नाम संबोधन करते हुए अपने पुराने जुमले को जनता पर फेंक कर चलते है कि दवाई भी, कड़ाई भी।

दवा बिन पस्त जनता


कड़ाई, का तो समझ में आ गया कि कहीं ना, कही यह हालत जनता और सरकार की खुद की लापरवाही से बिगड़ी है क्योंकि देश की ज्यादातर जनसंख्या का मास्क पहनने पर सांसे फूल रहीं थी।

उन्हें जब समझ नहीं आया कि अभी अगर सांसे फूलने से बचा लेंगे तो जीवन भर अपनों का साथ पा लेंगे।

अगर दवाई की बात करें तो उसके हालात किसी से छुपे नहीं है जिस दवाई रेमडेसिवीर इंजेक्शन का नाम 2020 से पहले कोई जानता नहीं था।

आज वह सोने से भी ज्यादा महंगी हो चूकी है जिसे पाने के लिए जरूरतमंद अपने घर को भी बेचने से हिचकिचा नहीं पा रहा है क्योंकि उसके इस प्रयास से वह अपने परिवार के बीमार सदस्य की सांसे खरीद सकता है।

रिश्ते है अनमोल


किसी अज्ञात ने बेहद सही कहा है कि “करोड़ो की जनता में से अगर लाख भी कम हो गए तो सरकारों का कुछ नहीं जाता, न उन नेताओं का जिन्होंने अपनी रैलियों को 500 की संख्या तक सीमित कर दिया है पर उस एक परिवार का जिंदगी भर का सुख-चैन चला जाएगा क्योंकि वो एक जाने वाला अपने पीछे अपने अनमोल रिश्ते छोड़ कर निर्मोही होकर चल देता है। इसलिए सरकारें आपको हालातों की असलियत से रूबरू नहीं करवाएंगी।


आप खुद देख रहे है कि यह महामारी अपना मुंह बड़ा करती जा रही है इसलिए वक्त बीतने के बाद सबक सीखने का कोई फायदा नहीं है।

अभी नहीं सीखेंगे सबक तो उनका सोचिए जो आपके साथ के लिए जी रहे है।

उन्हें सोच कर मास्क पहनिए सोशल डिस्टेसिंग अपनाएं। सरकारों को नहीं, आपके अपनों को आपकी बेहद जरूरत है।

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